जिला बदर का आदेश क्या है? जानें गुंडा अधिनियम 1970 में इसे लेकर क्या प्रावधान है
हाल ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने करण यादव नामक शख्स को छह महीने के लिए जिला बदर करने की घोषणा की है. पुलिस ने डुगडुगी पीटकर करण यादव को लखनऊ से छह महीने के लिए जिला बदर किया है. पुलिस ने गुंडा अधिनियम की धारा तीन के तहत ये कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. जिला बदर के आदेश का अर्थ आरोपी शख्स को जिले से बाहर रहना होगा और छह महीने तक उसे जिले में किसी प्रकार से प्रवेश वर्जित रहेगा. आइये जानतें हैं गुंडा अधिनियम की धारा 3 जिला बदर करने को लेकर क्या कहती है, जिला बदर के आदेश को कोई कैसे चुनौती दे सकता है, जिला बदर के आदेश को तोड़ने पर क्या होगी, आदि, आदि...
जिला बदर की घोषणा करती UP Police
लखनऊ के गोमती नगर विस्तार पुलिस ने खरगापुर निवासी करण यादव को लखनऊ की सीमा से 6 माह बाहर रहने का आदेश दिया है.
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क्या है गुंडा अधिनियम, 1970?
गुंडा अधिनियम की धारा 2 (बी), गुंडा शब्द को परिभाषित करती है, जिसके अनुसार उस व्यक्ति को गुंडा कहा जा सकता है जिसे भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आदतन आपराधिक गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति या तस्करी, जुआ या हथियार अपराधों से संबंधित तीन विशिष्ट कानूनों के तहत दोषी ठहराया गया हो. इसके अतिरिक्त, इसमें ऐसे व्यक्ति भी शामिल हैं जिन्हें समुदाय के लिए खतरनाक माना जाता है या जो महिलाओं एवं बच्चों के उत्पीड़न में शामिल हों.
गुंडा अधिनियम की धारा 3 (1), गुंडों को जिले से बाहर निष्कासन की बात करता है. जिला मजिस्ट्रेट उन व्यक्तियों को गुंडे के रूप में पहचान सकता है, जिनकी गतिविधियों से लोगों या संपत्ति को खतरा या नुकसान होता है. यदि गवाह सुरक्षा चिंताओं के कारण गवाही देने के लिए तैयार नहीं हैं, तो मजिस्ट्रेट को आरोपों के बारे में लिखित जानकारी प्रदान करनी चाहिए और उन्हें व्यक्ति के खिलाफ आरोपों के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका देना चाहिए.
धारा 3(2), जिस व्यक्ति के खिलाफ आदेश प्रस्तावित है, उसे वकील से परामर्श करने और अपना बचाव करने का अधिकार देता है. वहीं, गुंडा अधिनियम की धारा 3 (3) के अनुसार, जिला मजिस्ट्रेट लिखित आदेश जारी कर, जिसमें व्यक्ति को छह महीने तक निर्दिष्ट क्षेत्रों में प्रवेश करने से प्रतिबंधित किया जा सकता है, साथ ही उसे अपनी गतिविधि की रिपोर्टिंग की आवश्यकता हो सकती है, और कुछ वस्तुओं के कब्जे या उपयोग को सीमित किया जा सकता है.
वहीं, जिला बदर के आदेश का उल्लंघन करने पर आरोपी व्यक्ति को छह महीने से लेकर तीन साल तक की अवधि के लिए कारावास की सजा देने का प्रावधान है. इसके अतिरिक्त, अपराधी को जुर्माना भरना होगा