देश में बोरवेल,नलकूपों में बच्चों के गिरने की घटनाओं में हो रही वृद्धि, आखिर क्यों नहीं हो रहा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन
नई दिल्ली: आए दिन खबरों में, बोरवेल, नलकूपों में बच्चों के गिरने की खबरें देखने को मिलती रहती हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य के हापुड़ जिले में एक 6 साल का बच्चा 60 फ़ीट गहरे बोरवेल में गिर गया और उसे 5 घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन (Rescue Operation) के बाद सुरक्षित निकाला गया, लेकिन हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता है. ऐसे मामलों में कई लोगों ने अपनी जान गवाई है.
यह कोई अकेली घटना या हाल की समस्या नहीं है, बल्कि कई दशकों पुरानी समस्या है और इसमें वृद्धि ही देखने को मिल रही है. बोरवेल या ट्यूबवेल से संबंधित दुर्घटनाओं के बढ़ते मामलों के संदर्भ में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने एक पत्र याचिका पर 13 फरवरी, 2009 को स्वत: संज्ञान लिया था.
इस याचिका की अंतिम सुनवाई 6 अगस्त 2010 में मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाड़िया नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्य बेंच ने की थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका में कुछ दिशा निर्देश पारित किए थे, जिनका पालन करना केंद्र व सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के लिए अनिवार्य किया गया था.
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क्या थे दिशा निर्देश?
बोरवेल के लिए खुदाई शुरू करने से कम से कम 15 दिन पहले, कलेक्टर या ग्राम पंचायत को लिखित में सूचना देना अनिवार्य होगा.
इस खुदाई को करने वाली सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्था या ठेकेदार का किसी जिला प्रशासन या अन्य वैधानिक संस्था में पंजीकरण कराना अनिवार्य है.
बोरवेल या ट्यूबवेल के निर्माण के समय, वहां एक साइन बोर्ड लगवाना अनिवार्य होगा, जिस पर बोरवेल के निर्माण या उसके पुनर्वास के लिए खुदाई करने वाली एजेंसी का पूरा पता और उपयोगकर्ता एजेंसी या मालिक का पूरा पता लिखा होना चाहिए.
बोरवेल या ट्यूबवेल की खुदाई के समय, उसके आसपास कंटीले तारों की फेंसिंग की जानी चाहिए.
बोरवेल के केसिंग पाइप के चारों तरफ सीमेंट- कंक्रीट (Concrete) का 0.30 मीटर ऊंचा प्लेटफार्म बनाने को भी कहा गया था।.इस प्लेटफार्म की गहराई भी 0.30 मीटर होनी चाहिए.
बोरवेल के मुहाने पर स्टील की प्लेट वेल्ड करना या उसे नट-बोल्ट से अच्छी तरह कसना अनिवार्य होगा.
बोरवेल की मरम्मत के समय उसे खुला नहीं छोड़ा जा सकता है.
काम खत्म के तुरंत बाद खोदे गए गड्ढे और पानी वाले मार्ग को समतल किया जाना चाहिए. खुदाई अधूरी छोड़ने पर मिट्टी, रेत, बजरी, बोल्डर से गड्ढे को पूरी तरह जमीन की सतह तक भरा जाना चाहिए.
जिला कलेक्टर का यह कर्तव्य होगा कि न्यायालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन हो.
लेकिन इन दिशा निर्देशों पर आज तक पूरी तरह अमल नहीं किया गया है, जिसके कारण बोरवेल या ट्यूबवेल की खुदाई से जुड़े दुर्घटनाओं के मामलों में वृद्धि देखने को मिली है. इसी लिए फरवरी 2020 में एडवोकेट जी. एस. मणि द्वारा एक रिट याचिका दायर की गई थी.
याचिका में यह अनुरोध किया गया था कि दोषी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. इस याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है कि सुप्रीम कोर्ट के 2010 के दिशानिर्देशों का किस हद तक पालन किया गया है.