'पिता-पुत्री एक ही अदालत में', जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की करियर की एक झलक

My Lord Team

Image Credit: my-lord.in | 29 Mar, 2024

पांचवा, देश भर पॉक्सो अदालत बनाने और समय पर बाल यौन उत्पीड़नों की सुनवाई को लेकर जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने अहम फैसला सुनाया है.

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पिता भी जज

बेला एम त्रिवेदी के पिता न्यायिक सेवा में थे. सेवा के दौरान लगातार ट्रांसफर हुए, जिसके चलते उनकी शिक्षा विभिन्न स्कूलों में हुई है.

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एलएलबी किया

एमएस यूनिवर्सिटी, वडोदरा से बीकॉम-एलएलबी किया.

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हालांकि, जस्टिस त्रिवेदी ने अपने 85 पन्नों के असहमति वाले फैसले में कहा कि केवल संसद ही किसी जाति को एससी सूची में शामिल कर सकती है या उसे बाहर कर सकती है, और राज्यों को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है.

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सेशन कोर्ट में बनी जज

10 जुलाई 1995 को सीधे अहमदाबाद में सिटी सिविल और सेशन कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया.

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पिता-पुत्री एक ही अदालत में

यह एक सुखद संयोग रहा कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी तब उनके पिता पहले से ही सिटी सिविल और सेशन कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे.

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लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस

लिम्का बुक ऑफ इंडियन रिकॉर्ड्स ने अपने 1996 संस्करण में यह प्रविष्टि दर्ज की है कि “पिता-पुत्री एक ही अदालत में जज हैं.

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2011 में बनी HC की जज

17 फरवरी 2011 को गुजरात HC के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया.

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Rajasthan HC में हुआ ट्रांसफर

राजस्थान HC में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां उन्होंने जून 2011 से जयपुर बेंच में काम किया.

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चौथा पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह, सात जजों की संविधान पीठ, जिसमें जस्टिस बेला त्रिवेदी शामिल थीं, ने अगस्त 2024 में 6:1 के बहुमत से माना कि राज्यों को अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है.

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सुप्रीम कोर्ट में जज बनी

31 अगस्त, 2021 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत नहीं किया गया.

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साल 2025 में रिटायरमेंट

सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बेला एम त्रिवेदी 09 जून, 2025 को सेवानिवृत्त होंगी.

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